सोरायसिस क्या है उपचार, कारण, लक्षण और देखभाल
आप सभी लोगों का फिर से मेरे ब्लॉग में स्वागत है। आज हम चर्चा करेंगे सोरायसिस के बारे में जो एक कठिन त्वचा रोग है । जो कष्ट साध्य है तो चलिए शुरू करते हैं ।शरीर का आवरण है त्वचा।इसे शरीर का पर्दा भी कह सकते हैं।यह न केवल शरीर को गोरा काला सांवले रंग की पहचान देती है । और शरीर को सुरक्षित भी रखती है। त्वचा की बनावट कितनी अनोखी है इसका पता करना कठिन है । माइक्रो स्कोप से देखने पर एक वर्ग इंच त्वचा में करीब 72 फिट लंबी तंत्रिकाओं का जाल बिछा होता है ।एक वर्ग इंच त्वचा में लगभग 12फिट लंबी रक्त नलिकाएं होती हैं।जो समय पड़ने पर फैल भी जाती हैं जिससे शरीर की गर्मी बाहर निकल जाती है ।ऊपर से चिकनी दिखाई देने वाली त्वचा के अंदर बहुत सी धारियां होती हैं जो अंगुलियों के सिरे पर गोल चक्कर बनाती हैं,जिनसे अंगुलियों के निशान (फिंगर प्रिंट) बनते हैं।यह हैरान करने वाली बात है कि अंगुलियों के निशान सभी के अलग अलग होते हैं । इसी वजह से अपराधियों की अंगुलियों के निशानों के आधार पर पुलिस अपराधियों का पता लगा लेती है। कानूनी कार्रवाई में हस्ताक्षर के बजाए इसी लिए अंगूठे का निशान लिया जाता है । आएसा माना जाता है की अगर अरबों लोगों के उंगलियों के निशान इकट्ठे किए जाएं तो केवल दो लोगों के उंगलियों के निशान शायद एक जैसे होंगे।
कई कारणों से त्वचा में खराबी पनप जाती है । जिन्हें त्वचा रोग कहते हैं । ऐसा ही एक रोग है (सोरायसिस) त्वचा का यह रोग बहुत ही जिद्दी होता है जो बहुत मुश्किल से पीछा छोड़ता है ।इसे दूर करने के लिऐ लंबा इलाज करने की जरूरत होती है । आयुर्वेद में किस तरह इस रोग का इलाज होना चाहिए हम इसके बारे में यहां जानकारी दे रहें हैं । सोरायसिस त्वचा का एक आएसा रोग है ।जिसमें त्वचा का रंग शुष्क चांदी जैसे रंग के छिलके उभार के रूप में दिखाई देने लगते हैं ।और वहां से सफेद अभ्रक पत्र की तरह के सूखे छिलके उपड़ जाते हैं जिसके नीचे त्वचा फटी फूटी सी दिखाई देती है। सोरायसीस को रक्त सर्वापिका और छाल रोग भी कहते हैं ।इस रोग की शुरुआत एक छोटे से सूक्ष्म बिंदु सद्दश पीडिका के रूप में होती है ।जाके ऊपर एक बहुत छोटी पपड़ी सी लगी रहती है जिसे बिंदुकृत सोरायसिस कहते हैं। धीरे धीरे यह बढ़कर एक रुपए के सिक्के के आकार का बन जाता है।
कभी कभी धब्बों का व्यास क्षेत्र मंडलाकार 4/5 इंच की परिधि में बढ़ जाता है और उसका मध्य भाग साबूदाने की तरह दानेदार हो जाता है । इसमें जलन या खुजली या तो होती ही नहीं या बहुत कम होती है, वह शुष्क और पसीना रहित होता है।
रोगी की सेहत पर तो इसका कोई खास असर नहीं पड़ता लेकिन मानसिक चिंता बनी रहती है।
सोरायसिस रोग कोहनी के पीछे,और ठुइने के सामने सबसे अधिक एवम मुखमंडल करतल या तलवों में बहुत कम निकलता है । इसके ऊपर से अभ्रक या चांदी के समान छिलके निकलना इसका प्रमुख लक्षण है । सोरायसिस कष्ट साध्य है यानी कठिनता से जाता हैं।इसका इलाज धैर्य पूर्वक लंबे समय तक करना ही फलदायक हो सकता है ।सोरायसिस जिद्दी रोग है । इसकी चिकित्सा में कामयाबी उसी को मिलती है ,जिन्हें गुरु परंपरा का अनुभव हो या जो उचित औषधियों का चुनाव कर सकें ।
यहां सोरायसिस पर पंच तिक्त गुग्गुल पर आधारित चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा है ।
रोगी नित्य नीम के पत्तों के उबले जल से स्नान करे ।
मिस्सी (गेहूं _चने )की रोटी का सेवन करे तथा नमक का सेवन बिलकुल न करे ।
औषधि चिकित्सा
गंधक रसायन _30 गोली
रस माणिक्य_ 2.5 ग्राम
सत्व गिलोय _5ग्राम
इस मात्रा की कुल 10खुराकें कर के लेनी है
सुबह खाली पेट शहद के साथ ।
खाने के बाद
पंच तिक्त घृत गुग्गूल 2या3 गोली खादिरारिष्ट के साथ दोनो समय देते रहें ।साथ में 1_1 गोली आरोग्यवर्धिनी की भी दें ।आयुर्वेद में 18 प्रकार के कुष्ठ रोग बताए गए हैं ।इनमें सात बड़ेकुष्ठ और ग्यारह छोटे कुष्ठ रोग हैं।बड़े कुष्ठ रोग के अंतर्गत मंडल कुष्ठ को लिया गया है ।जिसे आधुनिक चिकित्सा में सोरायसिस कहते हैं। कुछ मामलों में यह कष्ट साध्य जबकि कुछ में असाध्य है यह रोग।
विरुद्ध आहार आदि कारणों से जब वायु, पित कफ तथा त्वचा रक्त लसिका और मांस दूषित हो जाते हैं तब कुष्ठ रोग की उत्पत्ति होती है
जब रोग धीरे धीरे विकसित हो जाता है ।इस रोग में नाखून अधिकता से आक्रांत होते हैं।सर्दी के मौसम में यह रोग उग्र हो जाता है । रोग की शुरुआत प्राय सिर की त्वचा से होती है वहां रूसी उत्तपन्न होती है तथा उसकी पपड़ी बन जाती है।जो काफी समय तक बनी रहती है । इसकी वजह से सिर की त्वचा सफेद सी दिखाई देती है। बाद में यह शरीर के अन्य भागों में भी फैल जाता है ।
आधुनिक मतानुसार सोरायसिस के कारण अज्ञात हैं,फिर भी आमवात (रूमेटिजम)और संधि वात (आर्थराइटिस) जैसे रोगों में उपद्रव स्वरूप होता है ।वैसे स्पष्ट कारण अभी तक मालूम नही हो सके हैं।मंडल कुष्ठ सोरायसिस में त्वचा की अंदरूनी परतों में विद्यमान रक्तवाहिनियां शिथिल हो कर फैल जाती हैं यानी उनमें सूजन आ जाती है ।रक्त वाहिनियों के आस पास पोलिमार्को न्यूक्लीयर तथा मोनो न्यूक्लियर नाम के सेल्स अधिकता से इकट्ठा हो जाते हैं । इस प्रकार अभयंतर त्वचा में कफजन्य सूजन होने से बाहरी त्वचा श्लेस्मिक स्तर की तह भी मोटी हो जाती है ।लेकिन स्वस्थ (रोगरहित) त्वचा पतली ही रहती है ।आयुर्वेद में कुष्ठ रोग को रक्त प्रदोषज विकारों के अंतर्गत माना जाता है और चूंकि सोरायसिस भी कुष्ठ का एक प्रकार है इस लिऐ जिस सिद्धांत के अनुसार रक्त जन्य या रक्त विकारों की चिकित्सा की जाती है ,उसके अनुसार सोरायसिस में खून की खराबी और बढ़े हुए पित की चिकित्सा करनी चाहिए।इसके आधार वायु प्रधान कुष्ठ में घृत का सेवन कफ प्रधान कुष्ठ में वमन और पित प्रधान में विरेचन तथा रक्त मोक्षण (जो चिकित्सा जोंक के द्वारा की जाती है ) कराना चाहिए इस रोग में कफ और वायु दोष प्रधान होने से वमन और विरेचन विशेष उपयोगी है । भावार्थ रूप में कह सकते हैं कि सोरायसिस में पंच कर्म कराना उपयुक्त है ।लेकिन पंच कर्म की व्यवस्था हर जगह उपलब्ध नहीं है,और कई रोगी पंच कर्म कराना नही चाहते, ऐसी स्थिति में शमन चिकित्सा का सहयोग लिया जाना चाहिए ।कुछ खास औषधियों का सेवन करा के शमन चिकित्सा की जानी चाहिए।इसके साथ लेप, मालिश इत्यादि कर्म भी कराने चाहिए
चरक संहिता के अनुसार मंडल कुष्ठ को मिटाने में गंधक माछिक , आंवला और शिलाजीत विशेष फलदायी हैं
गिलोय (अमृता ) का सेवन सोरायसिस में विशेष फलदायी हो सकता है ।गिलोय में रसायन कुष्ठधन , रक्तशोधक पित्त शामक साथ साथ त्रिदोष शामक गुण तो होते ही है । अत: गिलोय का ताजा रस रोज सुबह 2 _2 तोला दिन में 3 बार लेते रहने रहें ।गिलोय का क्वाथ (काढा)बना कर सेवन किया जा सकता है। गिलोय घन वटी या शुद्ध गिलोय का सेवन करें तो दोस्तों कैसी लगी आप लोगों को सोरायसिस के बारे में जानकारी अगर आप लोगों को ये जानकारी अच्छी लगी हो तो और लोगों को भी शेयर करें और कुछ कमी होती कमेंट करें तो फिर मिलेंगे अगले ब्लॉग में खुश रहिए और अपना ख्याल रखिए
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